Paheliyan  501se 510 tak

सीर पर सिकुड़ी, आगे छितरी, हर घर में है साजा, शान  चलती धूल उड़ाती, करती काम यह ताजा। उत्तर – झाड़ू

एक पुरुष  अचरज भेद, हाड़ – हाड़ में वाके छेद मोहि अचंभा आवे ऐसे, जीव बसे हैं वामे कैसे। उत्तर – पिंजरा

एक मर्द और नारी चार, सब मिल जुल आते व्यौहार, इनके घर में भेद न कोई, खान -पान एक साथहिं होई। उत्तर – पंजा

एक पेड़ का अचरज लेखा, मोती फैलाते आंखों देखा , जहां से उपजे वहां समाय, जो फल गिरे, जल – जल जाय। उत्तर – फव्वारा

कालिख मलना ही सिंगार, आग ही इसका होवे यार। उत्तर – हांड़ी

गोल – मटोल खाल है मोटी, देह पर फैला कांटा , कच्चा चढ़े कड़ाही में, पका तो आम – सा बांटा। उत्तर – कटहल

एक बढ़ पत्ता , वह भी लत्ता। उत्तर – झंडा

एक बहादुर छोटी काया, बोले -बोले दुःख देने आया। उत्तर – मच्छर