Paheliyan  601 se 620 tak

काली है, पर काग नहीं, लंभी है, पर नाग नहीं , बल खाती, पर डोर नहीं, बांधते है , पर डोर नहीं। उत्तर – चोटी

एक बीत्ता का अप्पा – अप्पा, सवा बित्ता का है डंडा, जब – जब पिया इसे हिलाए, तब – तब देवे ठंडा। उत्तर – हाथ का पंखा

एक बित्ता का काठ, अजब है इसका पाठ, जो इसे कुचले – फारे, उसी को ये खूब निखारे। उत्तर – दातौन

एक डिब्बी में बून्द डोबा, कागज पर है लेखा – जोखा। उत्तर – दावात – कलम

काला हूँ इसीलिए विश्व, मुझे काला हिरा कहता, मुझसे दुनिया रोशन होती, आग में तपता रहता। उत्तर – कोयला

मुंह काला, पर काम बड़ा है, कद छोटा पर नाम बड़ा है , मेरे वश में दुनियां सारी, रहूं जेब में सस्ती प्यारी। उत्तर – कलम

गहरा ताल, खौलता पानी, तैरने पर ही फूलती रानी। उत्तर – पूरी